कितनी उलझनों का शिकार है ज़िन्दगी !

कितनी उलझनों का शिकार है ज़िन्दगी !

कितनी उलझनों का शिकार है ज़िन्दगी !

एक मुदत से अपनी बेक़रार है ज़िन्दगी !!

हर सास बयाज की सूरत हो रहा है अदा !

किसी महाजन से लिया उधार है ज़िन्दगी !!

कोई जोश है न उमंग है  न ख्वाईस न आरज़ू !

जबसे बिछुड़े तुम तबसे  बेक़रार है जिंदिगी !!

चलो  कही और चले गम न हो जहां !

इस शहर में तो दर्द का  अम्बार है ज़िन्दगी !!

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