Story of Tulsidas ! Tulsidas in Hindi

 

Story of Tulsidas ! Tulsidas in Hindi


Tulsidas in Hindi - तुलसीदास की कहानी !

लगभग चार सौ साल पहले, धर्मस्थल शुकरखेत (आज सोरों, जिला-एटा उप्र ) में संत नरहरिदास का आश्रम था। वह एक विद्वान उदार और सर्वोच्च भक्त थे। वे अपने आश्रम में लोगों को बड़ी श्रद्धा के साथ राम कथा सुनाते थे। एक दिन नरहरिदास जब कथा सुना रहे थे, उन्होंने भक्तों की भीड़ में एक बालक को शांत भाव से कहानी सुनते देखा। बालक की ध्यान-मुद्र| और तेजस्विता देख उन्हें उसके महान आत्मा ही। की अनुभूति हुई। उनकी यह अनुभूति बाद में सत्य सिद्ध भी हुई। 

नाम:- गोस्वामी तुलसीदास
माता का नाम:- हुलसी देवी
पिता का नाम:- आत्माराम दुबे
जन्म:- 1589
शिक्षा:- वेद, पुराण एवं उपनिषद् इत्यादि !
पत्नी का नाम:- रत्नावली
धर्म:- हिन्दू
प्रसिद्ध ग्रन्थ:- दोहावली, कवितावली,रामचरितमानस, विनयपत्रिका,
   

 बाद में उनका अहसास सही साबित हुआ। यह लड़का कोई और नहीं बल्कि (Goswami Tulsidas) तुलसीदास थे। जिन्होंने महान महाकाव्य रामचरितमानस की रचना की।

तुलसीदास का जन्म राजापुर (चित्रकूट) में हुआ था, जो यमुना तट पर स्थित है। तुलसीदास के पिता का नाम आत्म राम दुबे और माता का नाम हुलासी देवी था। तुलसीदास के जन्म स्थान के बारे में विद्वानों में मतभेद है। जन्म के कुछ समय बाद, माता-पिता की छाया उनके सिर से उठ गई। संत नरहरिदास ने उन्हें अपने आश्रम में शरण दी। वहाँ रहते हुए उन्होंने राम कथा सुनी। पंद्रह वर्षों तक कई ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद, तुलसीदास अपने जन्म स्थान राजापुर चले आए। यहीं पर उनका विवाह रत्नावली से हुआ था। एक दिन जब तुलसीदास  कहीं बाहर चले गए।  तो रत्नावली अपने भाई के साथ मायके (पिता के घर) चली गई, घर लौटने पर जब तुलसी को पता चला, तब  वै उल्टे पाँव ससुराल पहुँच गए। तुलसीदास को देखकर उनके ससुराली जन स्तब्ध रह गए। रत्नावली भी लज्जा और आवेश से भर उठी | उसने घचिक्कारते हुए कहा तुम्हे लाज नहीं आती, हाड़- माँस के शरीर से इतना लगाव-रखते हो। इतना प्रेम ईश्वर से करते तो अब तक ना जाने क्या हो जाते। पत्नी की तीखी बातें तुलसी को चुभ गयीं। वे तुरन्त वहाँ से लौट पड़े।

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घर द्वार छोड़कर कई जगहों पर भटकते हुए, फिर एक साधु का रूप धारण कर, खुद को श्री राम की भक्ति में समर्पित कर दिया।


काशी में श्री राम की भक्ति में लीन तुलसी ने हनुमान को देखा, कहा जाता है कि उन्होंने हनुमान से श्री राम के दर्शन करने के लिए कहा, हनुमान ने कहा कि राम का दर्शन चित्रकूट में होगा, उन्होंने चित्रकूट में राम का दर्शन किया, चित्रकूट में तुलसीदास अयोध्या आए। यही सम्वत १६३१ में उन्होंने राम चरित्र मानस की रचना प्रारम्भ की। उनकी यह रचना काशी के अस्सी घाट में 1६33 ईस्वी में 2 साल 7 महीने 26 दिनों में पूरा हुआ था। सार्वजनिक भाषा में लिखा गया यह ग्रन्थ, राम चरित्र मानस न केवल भारतीय साहित्य में बल्कि विश्व साहित्य में भी एक अनूठी पुस्तक है। इसका अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। श्री राम का चरित्र रामचरितमानस में वर्णित है। इसमें जीवन के लगभग सभी पहलुओं का नीतिगत वर्णन है। भाई का भाई, पत्नी का पति, पति की पत्नी, गुरु का शिष्य, शिष्य का गुरु, राजा की प्रजा से कैसा व्यवहार होना चाहिए। इस बात का बहुत ज्वलंत चित्रण है। राम की रावण पर विजय इस बात का प्रतिक है कि सदैब अच्छाई पर बुराई ,असत्य पर सत्य की विजय होती है। 

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  तुलसीदास ने जीवन में सुख और शांति के विस्तार के लिए जहाँ न्याय, सत्य और प्रेम को आवश्यक माना है, वहीं दूसरों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म कहा है। उनकी दृष्टि में लिखा है कि दूसरों को दुख पहुंचाने से बड़ा कोई पाप नहीं है -

उन्होंने लिखा है की -

परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।


रामचरित्रमानस के माध्यम से तुलसीदास ने जीवन की अनेक समस्याओ की समाधान प्रस्तुत किया है । इसी कारन राम चरित्र मानस केवल धार्मिक ग्रन्थ न होकर पार्रिवारिंक, सामाजिक एवं नीति सम्ब्धी व्यवस्थाओं का पोषक ग्रन्थ भी है। तुलसी- ने रामचरित मानस के अलावा और भी ग्रन्थों की रचना की है। जिनमें विनय पत्रिका, कवितावली, दोहावली, गीतावली आदि प्रमुख है। 


तुलसीदास समन्यवादी थे। उन्हें अन्य धर्मों, मत-मतान्तसें में कोई विरोध नहीं दिखायी पड़ता था। तुलसीदास जिस समय हुए।  उस समय मुगल सम्राट अकबर का शासन काल था। अकबर के अनेक दरवारिओ से उनका परिचय था। अब्दुर्रहीम खानखाना से जो स्वयं बहुत बड़े विद्वान तथा कवि थे, तुलसीदास की मित्रता थी। उन्होंने तुलसीदास की प्रशंसा में यह दोहा कहा-

   

सुरतिय, नरतिय, नागतिय, यह चाहत सब कोय।

   गोद लिए हुलसी. फिरै, तुलसी सो सुत होय।।


तुलसीदास अपने अंतिम समय में काशी में गंगा किनारे अस्सी घाटमें रहते थे। वहीं इनका देहावसान  सम्बतें १६८० में हुआ | इनकी मृत्यु को लेकर एक दोहा प्रसिद्ध है- 


संबत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।

श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यों शरीर।।


भक्त, साहित्यकार के रूप में तुलसीदास हिन्दी भाषा के अमूल्य रत्न थे। 

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